गुरु और शिष्य का सम्बन्ध

गुरु और शिष्य का सम्बन्ध समझने में लोगों को भूल व भ्रम पैदा होते रहते हैं। हालांकि बात स्पष्ट है कि गुरु रास्ता दिखाने वाला है और शिष्य अपना जोर लगाता है। शिष्य क्या करे? जैसा रास्ता उसे दिखता है वैसा कार्यक्रम करता है परन्तु यह समझता सही है कि शिष्य कुछ समझता नहीं है। होगा वही जो गुरु की ताकत से होगा।

सतसंगी की रहनी

प्रत्येक सतसंगी को जब वह सतसंग में उपस्थित हो उसे सावधानी यह रखनी जरूरी है कि अपने वादे के अनुसार सदा अपनी दैनिक क्रिया में तत्पर रहे और सत्य के पथ को अपनाने में कुसंग से बचता रहे ताकि अपना स्वभाव संसारी भाव का न बनने पाये। आदत ही को बदलना संतमत ही खास हिदायत है।

JaiGurudev Dharma Pracharak Sanstha

गुरु के अनमोल वचनों

Jai Guru Dev, महानुभाव अमृत जैसे वचनों की धारा गुरु के मुखारविंद से निकलती है जो अनमोल रत्न या अनमोल वचन कह सकते हैं। गुरु के वचनों को हमेशा याद रखो, वह हमारे जीवन में हर तरह से सार्थक होते हैं। शारीरिक मानसिक और संसार एवं आध्यात्मिक जीवन में सुधार के लिए गुरु के वचनों को हमेशा याद रखना चाहिए, गुरु के वचन हमारे जीवन में एक अच्छी पथ पर ले जाता है और प्रभु प्राप्ति तक सार्थक और सिद्ध होते हैं। महानुभाव इस आर्टिकल में याद रखो गुरु के वचन स्वामी जी महाराज द्वारा दिए गए अनमोल सत्संग धारा को अक्षरों के माध्यम से आपके साथ सांझा किया जा रहा है आप पूरा पढ़ें। जय गुरुदेव।

सदा अपने हृदय को जांचते रहो, कहीं उसमें काम, क्रोध, बैर, ईर्षा, घृणा, हिन्सा-मान और मद रूपी शत्रु घुस कर घर न कर लें। इनमें जिस किसी को देखो तुरन्त हटाने का प्रयत्न करो और इनको मार कर भगा दो। पर देखना बड़ी बारीक निगाह से सचेत होकर वे चुपके से अन्दर आकर छुप जाया करते हैं और अवसर पाकर अपना विकराल रूप प्रकट करके जीव के ऊपर आक्रमण करते हैं।

किसी के बुरे आचरण को देखकर उसे पापी मत मानो बल्कि उसका मित्र और हमदर्द बनकर उसके भविष्य के बुरे आचरणों को निकालने का प्रयास करो। हो सकता है उस पर मिथ्या दोषारोपण ही किया जाता हो और वह उससे अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने की परिस्थिति में पड़कर अनिच्छा से कोई बुरा कर्म कर लिया हो, परन्तु उसका अन्त: करण तुमसे अधिक स्वच्छ हो।

इस संसार में सभी सराय के यात्री हैं। थोड़े से समय के लिए एक जगह टिके हैं। सभी को समय पर यहाँ से चल देना है। घर, धन, पुत्र, स्त्री आदि किसी का नहीं है फिर इन नापाएदार वस्तुओं के लिए किसी से लड़ना नहीं चाहिये।

यह छोटी-सी दुनिया है ज्ञानी महात्मा मिलेंगे तब अंदर का विशाल दृश्य देखेंगे। तब यह आभास होगा जब पूर्ण ज्ञानी महात्मा मिलेंगे।

जय गुरुदेव नाम योग साधना मंदिर, खितौरा

अपना शिव नेत्र खोल के प्रभू दर्शन

सदा अपने हृदय को जांचते रहो, कहीं उसमें काम, क्रोध, बैर, ईर्षा, घृणा, हिन्सा-मान और मद रूपी शत्रु घुस कर घर न कर लें।

पाप छूटने का मुख्य उपाय

पराये पापों के प्रायश्चित की चिन्ता न कर पहले अपने पापों का प्रायश्चित करो। किसी के दोष को देखकर उससे घृणा न करो और न बुरा चाहो।

आलस न करना ही सफलता

अपने दोषों को बाहर से कहलवाने का प्रयास न कर मन से निर्दोष बनना चाहिये।

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अपने अन्तःकरण को भी टटोलते रहना साधक का मुख्य धर्म है। अन्तःकरण में काम, क्रोध, हिंसा, द्वेष, बैर, ईर्ष्या, मान अहंकार अपना घर न करने पावे। बुरा कहलाना अच्छा है, परन्तु अच्छा कहलाकर बुरा बने रहना ही बहुत खराब है। तुम्हारे शरीर से किसी प्राणी का उपकार हो जाये तो यह घमन्ड न करो कि मैंने उसका उपकार किया है।

यह निश्चय जानो कि उसको तुम्हारे द्वारा बनी हुई सेवा से जो सुख मिलता है सो निश्चय ही उसके शुभ कर्म का फल है। तुम तो निमित बन गये हो। महाप्रभू का धन्यवाद करो जो उसने तुम्हें किसी को सुख पहुँचाने के निमित्त बनाया। और उस जीव का उपकार मानो जो उसने तुम्हारी सेवा अंगीकार की।

इस वास्ते कभी भूल कर भी किसी का नुक़सान न चाहो। प्रभु से सर्वदा यह प्रार्थना करते रहना चाहिए कि प्रभू व हे गुरूदेव, मुझे ऐसी सद्बुद्धि व सद्भावना दो कि मैं किसी प्राणी मात्र जीव को दुःख न दूँ और सदैव सबके साथ सत्कर्म करता रहूँ और साध सेवा करता रहूँ।

कोढ़ी, दुखी, अपाहिज को देखकर मन में हिचक न पैदा करो। अतएव यह सदा समझते रहो कि इनके पिछले कर्मो का फल है जैसा कि वे उसका फल पा रहे हैं। उससे घृणा व रूखापन न लाओ वह चाहे पूर्व का कितना ही पापी हो। तुम्हारा धर्म उसके पाप देखने का नहीं है। तुम्हारा धर्म भलाई करना तथा सेवा करने का है। तुम्हारे प्रभु की तुम्हारे प्रति यही आज्ञा है।

सच्चा और महासुख प्रभु का है जो सदा रहता है। संसारी सम्पत्तियाँ या मित्रो को पाकर अभिमान न करो, जिस प्रभु ने उन्हें यह सब कुछ दिया उसका शुकर करो और शाम सुबह उसे मत भूलो। सच्चा प्रभु का प्रेमी वही है जिसका अन्तःकरण सब पापों से रहित है और अपने गुरूदेव के चरणों में नित्य प्रति हमेशा लगा रहता है भक्त और साधु बनना चाहिए कहलाना नहीं चाहिए,

जो दिखाने के लिए भक्त बनना चाहते हैं वे तो पापों से ठगे जाते हैं। ऐसे लोगों पर पहिला हमला झूठ का होता है। दुष्कर्मी मनुष्य ही अपने पापों का दोष हल्का करने या पापों में रत होने के लिए शास्त्रों तथा सदग्रन्थों का मनमाना अर्थ करता है और उससे अपना स्वार्थ हासिल करता है।

पराये पापों के प्रायश्चित की चिन्ता न कर पहले अपने पापों का प्रायश्चित करो। किसी के दोष को देखकर उससे घृणा न करो और न उसका बुरा चाहो। यदि ऐसा न करोगे तो उसका दोष तो न मालुम कब दूर होगा। बराबर प्यार भाव करो और समझाते रहो। यदि तुम्हारी समझौती से न माने तो तुम उससे कम मिलना करो वह अपने किए का फल आप पायेगा।

प्रभु को साथ रखकर काम करने से ही पापों से रक्षा और कार्य में सफलता होती है। बैरी अपना मन ही है इसे जीतने की कोशिश करनी चाहिये। स्वयं पापों को देखते रहो और उन्हें जो अपने प्रिय मित्र और गुरूजन हों उनसे कह डालो। यह पाप से छूटने का एक मुख्य उपाय है